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न्याय दर्शन

 न्याय दर्शन 




भारतीय दर्शन में छः प्रमुख दार्शनिक सम्प्रदाय है। इसमें से एक न्याय दर्शन है। इसके प्रणेता महर्षि गौतम है। इन्होंने न्याय सूत्र नामक अपनी किताब में इस दर्शन का प्रतिपादन किया है। 
इस दर्शन की प्रमुख विशेषता यह तर्क है अर्थात यह तर्कों के माध्यम से किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है। 

न्याय दर्शन में प्रमा 

इस दर्शन में यथार्थ ज्ञान को प्रमा कहा गया है। अर्थात यदि हमारे सामने कोई लैपटॉप रखा हुआ है तथा हम उसे लैपटॉप ही कहते है तो यह प्रमा के अन्तर्गत आता है। न्याय दर्शन में प्रमा के तीन विशेषता बताएँ गए है -
  1. अनुभत्व - हमारे सामने अगर कोई लैपटॉप रखा हुआ है था उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है तो यही प्रमा है।
  2. निश्चितता -अर्थात किसी  पदार्थ के विषय में कोई शंका नहीं होनी चाहिए। 
  3. यथार्थत्व - अर्थात किसी वस्तु का निश्चित ज्ञान होना चाहिए। 

प्रमा के अंग 

  1. प्रमाता -प्रमा अर्थात यर्थाथ ज्ञान की प्राप्ति तभी हो सकता है जब ज्ञान प्राप्त करने वाला कोई चेतन मनुष्य हो । 
  2. प्रमेय - चेतन मनुष्य को तभी ज्ञान प्राप्त हो सकता है जब ज्ञान से सम्बंधित कोई विषय सामग्री हो। 
  3. प्रमाण - ज्ञान के साधन को प्रमाण कहते है। 

अप्रमा 

भ्रम या संशय को अप्रमा कहते है। यदि कोई व्यक्ति रस्सी को साँप मान लेता है तो इस तरह के ज्ञान को अप्रमा कहते है। 
इसके अंतर्गत तर्क को भी शामिल किया जाता है. तर्क को अप्रमा के अन्तर्गत इसलिए शामिल किया जाता है क्योकि तर्क से निश्चित ज्ञान तथा किसी वस्तु की निश्चितता के विषय में कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

असत्कार्यवाद  

न्याय दर्शन में असत्कार्यवाद का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके अनुसार कार्य उत्पति के पूर्व कारण में विद्यमान नहीं होता है। इसे निम्न बातों के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है -
  1. यदि कार्य कारण में पहले से स्थित होता तो कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। 
  2. कार्य यदि कारण में उपस्थित होता तो दोनों के प्रयोजन एक होते परन्तु ऐसा नहीं होता। 
  3. कार्य तथा कारण का रूप भी अलग होता है। 
स्रोत 
भारतीय दर्शन शोभा निगम 
भारतीय दर्शन की रुपरेखा हरेंद्र प्रसाद सिन्हा 







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